रविवार, 17 जनवरी 2010

मोटे अनाजों की खेती का महत्व

एक समय था जब भारत की कृषि –उत्पादन प्रणाली में काफी विविधता देखने को मिलती थी। गेहूं, चावल, जौ, राई, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि अनेक प्रकार की फसलें उगाई जाती थी। अब यह स्थिति यह है कि आजादी के बाद बदली कृषि-नीति ने भारतीयों को गेहूं व चावल आदि फसलों पर निर्भर बना दिया। इसके अलावा बाजारीकरण के बढ़ते प्रभाव से लोगों का मोटे अनाजों, दलहनों और तिलहनों से मोहभंग होता चला गया।
हरित क्रान्ति के दौर में जिस एकफसली खेती को बढ़ावा मिला उसमें धान और गेहूं जैसी फसलों को केन्द्रीय भूमिका प्रदान की गई।इसका परिणाम यह हुआ कि कुल कृषि भूमि में से मोटे अनाजों की पैदावार घटती गई। उदाहरण के लिए1966 से लेकर 2006 तक के पिछले चार दशकों में चावल का उत्पादन 3.8 करोड़ टन से बढ़कर 8.6 करोड़ टन और गेहूं का उत्पादन 1.5 करोड़ टन से बढ़कर सात करोड़ टन हो गया जबकि दूसरी तरफ मोटे अनाजों का उत्पादन 1.85 करोड़ टन से घट कर 1.8 करोड़ टन हो गया। इसका मतलब यह है कि पिछले चार दशकों के बीच मोटे अनाजों की तुलना में धान का उत्पादन दो गुना और गेहूँ का उत्पादन तीन गुना बढ़ गया।
गेहूं और धान के क्षेत्र-विस्तार के क्रम में स्थान विशेष के पारिस्थितिकीय हालात, मि़ट्टी की संरचना, नमी की मात्रा, भू-जल आदि की घोर उपेक्षा की गई। दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक और असन्तुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता काफी प्रभावित हुई। सिंचाई के लिए सब्सिडीयुक्त डीजल व बिजली ने भू-जल के अंधाधुंध दोहन बढ़ावा दिया जिससे भ-जल स्तर गिर कर पाताल में पहुंच गया।
अत: अब एक ऐसी नई हरित क्रान्ति लाने की आवश्यकता है जिससे मोटे अनाजों की पैदावार में वृद्धि हो सके। इससे जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, भू-जल ह्रास, स्वास्थ्य और खाद्यान्न संकट जैसी समस्याओं को काबू में किया जा सकता है। इन फसलों को पानी, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की जरूरत कम पड़ती है जिससे मिट्टी व भू-जल स्तर पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अलावा इन फसलों को उगाने में खेतीकी लागत भी कम आती है। सूखा प्रतिरोधी होने के साथ-साथ ये फसलें कम उपजाऊ भूमि पर भी सफलता से उगाई जा सकती है। पौष्टिकता और सेहत के मामले में भी मोटे अनाज गेहूं व चावल पर भारी पड़ते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, लोहा, विटामिन और अन्य खनिज चावल और गेहूं की तुलना में दो गुने अधिक पाए जाते हैं। इन विशेषताओं के बावजूद मोटे अनाज किसानों, कृषि-वैज्ञानिकों और नीति-निर्धारकों की नजर में उपेक्षित है तो इसके पीछे प्रमुख कारण जनसाधारण में इनके प्रति फैली उपेक्षा की भावना है।
लम्बे समय से मोटे अनाजों की खेती को मुख्य धारा में लाने के लिए प्रयासरत ‘दकन डेवेलपमेन्ट सोसायटी’ का सुझाव है कि मोटे अनाजों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित किया जाय, जैसे राजस्थान में बाजरा और दक्षिण भारत में रागी का वितरण हुआ है। इन अनाजों के लिए लाभकारी समर्थन-मूल्य घोषित हो और इनकी सरकारी खरीद, भंडारण व विपणन के लिए प्रभावी नेटवर्क बनाया जाए। गेहूं और धान की भाँति मोटे अनाजों के अनुसंधान व विकास की सुविधाएं देश भर में स्थापित की जाए। बैंकों, वित्तीय संस्थाओं आदि को मोटे अनाजों की खेती के लिए रियायती दर पर ऋण सुविधा देने के लिए कानून बनें। सरकार सब्सिडी नीति की दिशा मोटे अनाजों की खेती की ओर भी मोड़े तो अच्छा ही होगा। इन उपायों से न केवल रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का आयात व प्रयोग कम होगा, बल्कि मिट्टी, भू-जल के साथ-साथ मनुष्य का स्वास्थ्य भी सुधरेगा।
इस प्रकार बदलते मौसम चक्र, एकफसली खेती से हो रहे नुकसान अदि को देखते हुए मोटे अनाजों की खेती भविष्य में उम्मीद की किरण के समान है। इससे न केवल कृषि का विकास होगा बल्कि खाद्य-सुरक्षा के साथ-साथ उचित पोषण और स्वस्थ्य-सुरक्षा भी हासिल होगी।

भारत में कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव:

भारत प्राचीन समय से ही एक कृषि प्रधान देश रहा है | कृषि यहाँ की बुनियादी अर्थव्यवस्था है | लेकिन १९९१-९२ से ही भारत वैश्वीकरण और उदारीकरण के प्रभाव में आकर कृषि के रूप में अपनी उस आधारभूत व्यवस्था को कमजोर कर रहा है,जो न केवल एशिया में बल्कि पूरी दुनिया में इसकी प्रभावशाली और मजबूत हैसियत बनाने में काफी सहायक सिद्ध हुई है | भारत में विदेशी पूंजीनिवेश,औद्योगिकीकरण में वृद्धि तथा खुली बाजार व्यवस्था के कारण भारतीय कृषि व्यवस्था को काफी आघात पहुंचा है तथा इनके कारण हमारी उत्पादकता में कमी आयी है एवं हमारा घरेलू निवेश भी प्रभावित हुआ है |खुली बाजार व्यवस्था के कारण हमारे कुछ प्रमुख खाद्य पदार्थों जैसे-चावल,गेहूं,खाद्यतेल और चीनी आदि के आयात-शुल्क में कमी होने से इनकी उत्पादकता प्रभावित हो रही है एवं इनकी कीमतों में तेजी से वृद्धि होती जा रही है | हम आत्मनिर्भरता से परनिर्भरता की ओर बढ़ते जा रहे हैं | भारत में कृषि एवं खाद्य असुरक्षा का आयात हो रहा है | हम न तो पूरी तरह से एक सफल औद्योगिक व्यवस्था को ही अपना पाए हैं और न ही अपनी बुनियादी अर्थव्यवस्था के रूप में कृषि व्यवस्था को ही सुदृढ़ कर पाए हैं|
कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव:
१) किसानों को उनके उत्पादन लागत से अधिक मूल्य मिले एवं सरकार द्वारा उन्हें पर्याप्त आर्थिक मदद व प्रोत्साहन के साथ-साथ कृषि हेतु प्रचुर मात्रा में उपयुक्त संसाधन उपलब्ध कराया जाए |
२) कृषि उत्पादों के क्रय-विक्रय हेतु पद्सोपान व्यवस्था की तरह राज्य-स्तर,मंडल-स्तर,जिला-स्तर,क्षेत्र-स्तर एवं ग्राम-स्तर पर मंडियों की व्यवस्था की जाये तथा बाजार-व्यवस्था की देख-रेख और मूल्यों के निर्धारण के लिए एक 'निगरानी समिति' का गठन किया जाए |
3) बाजार-प्रशासन में सुधार लाया जाये तथा बिचौलियों व कालाबाजारियों द्वारा कृषि-उत्पादों के क्रय-विक्रय एवं मूल्य निर्धारण में गडबडी करने पर रोक लगाई जाए |
४) कृषि योग्य भूमि का पुनर्वितरण समानता के आधार पर किया जाए ताकि कृषि कार्यों में रूचि रखने वाले भूमि-विहीन लोगो को दूसरे के खेत को बट्टे पर लेकर खेती करने और घाटा सहने की नौबत न आए | इसके अतिरिक्त ऐसी व्यवस्था हो जिससे किसी व्यक्ति को दूसरे के खेत में बेगारी करने एवं कर्ज में डूब कर आत्मह्त्या करने की नौबत न आए |
५) कृषि-व्यवस्था पर पड़ रहे वैश्वीकरण और उदारीकरण के प्रभाव को कम किया जाए तथा जहां तक हो सके उद्योगों की अपेक्षा कृषि को ज्यादा महत्व दिया जाए | क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है| ६) किसानों के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त मात्रा में ऋण,बीमा और सब्सिडी आदि की सुविधा प्रदान किया जाए जिससे किसानों में हीन भावना न उत्पन्न हो तथा कृषि सम्बन्धी कार्यों को करने के लिये उनमें नयी ऊर्जा एवं उत्साह का संचार हो |
७) भारत में कृषि के क्षेत्र में उच्चस्तरीय अनुसंधान,तकनीक-निर्माण और नए-नए उपयुक्त अविष्कारों पर बल दिया जाए | इस सम्बन्ध में देश के कृषि वैज्ञानिकों को सचेत होकर गंभीरता से कार्य करना चाहिए | इन्हें विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण करके चौपालों एवं सगोष्ठियों के माध्यम से किसानों उचित परामर्श देने का कार्य करना चाहिए |
८) विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) की स्थापना उन क्षेत्रों में की जानी चाहिए जहां की भूमि अनुपजाऊ और बंजर हो एवं उपयुक्त संसाधनों के अभाव में खेती घाटे का सौदा हो जाती है | इससे इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे | लेकिन ऐसे क्षेत्र,जहां उपजाऊ भूमि के साथ खेती के लिए प्रचुर मात्रा में उपयुक्त संसाधन सुलभ हो वहाँ सरकार द्वारा सेज की स्थापना का ख्याल छोड़ कर किसानों को कृषि-कार्य के लिए अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए |
९) ऐसे बाग़-बगीचे एवं वन-क्षेत्र,जो पुराने हो चुके हैं,सूख रहें हैं और उजड़ रहें हैं,उन क्षेत्रों में कृषि-कार्य को अधिक बढावा दिया जाना चाहिए | क्योंकि पुराने वन-क्षेत्रों और बगीचों की भूमि काफी उपजाऊ होती है | वहाँ की मिट्टी में नत्रजन की मात्रा अधिक होती है | इसके अलावा जिन क्षेत्रों की भूमि अपनी उर्वरा-शक्ति खो चुकी हैं वहाँ बागवानी एवं वृक्षारोपण को बढावा दिया जाना चाहिए |
१०) मृदा-संरक्षण एवं परती भूमि विकास कार्यक्रम,कृषि जलवायु प्रादेशीकरण,वाटर शेड प्रबंधन,अनुशासित रूप से फसल-चक्र के नियम का पालन आदि कृषि के विकास और सुधार के लिए काफी उपयोगी व सार्थक हैं | इनके बारे में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए |