आस्था पवित्र मन से भावनात्मक लगाव का प्रतीक है। हम जिनके प्रति अपनी आस्था रखते हैं उसके प्रति हम पवित्र मन से भावनात्मक लगाव रखते हैं। पवित्र मन से भावनात्मक लगाव पर आधारित यह भक्ति और आस्था भी मनुष्य को सज्जन और सभ्य बनाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आस्था व भक्ति प्राय: सभी पंथों और समुदायों में समान रूप से पायी जाती है। हिन्दुओं में राम, कृष्ण, शिव, परशुराम, विष्णु, दुर्गा, सरस्वती, सती, सीता, लक्ष्मी आदि से लेकर महाराणा प्रताप, शिवाजी, विवेकानन्द, डॉ० भीम राव आम्बेडकर, लक्ष्मीबाई, पद्मावती, सावित्री बाई फुले, रमाबाई आदि तक और मुस्लिमों में अल्लाह, ख़ुदा, पैगम्बर मुहम्मद साहब और उनकी बेगम के साथ-साथ हसन-हुसैन से लेकर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अन्य सूफी संतों व बलिदानियों तक आस्था की लम्बी-लम्बी श्रृंखलाएं हैं। इसी प्रकार सिक्खों, बौद्धों, जैनों, इसाइयों, पारसियों सहित अन्य सभी पंथों में इनसे सम्बन्धित महापुरुषों, सन्तों, बलिदानियों और महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के प्रति आस्था की विद्यमानता है। इसलिए कला, फिल्म या अन्य सभी विधाओं के माध्यम से किसी भी पंथ या समुदाय से सम्बन्धित महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों का चित्रण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना जरूरी है कि लोगों की भावनाओं को चोट न पहुँचे। इसके अलावा यह भी ध्यान में रखना होगा कि यदि एक पंथ या समुदाय की आस्था व भावनाओं से खिलवाड़ होगा तो उसकी प्रतिक्रिया में दूसरे पंथ की आस्था व भावनाओं से खिलवाड़ होने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
"एक बात और ध्यान में रखने की जरूरत है कि "भारतीय संविधान आस्था या उपासना के नाम पर 'लोक-व्यवस्था', 'स्वास्थ्य', 'सदाचार' और किसी की 'निजता' या 'एकान्तता' के साथ खिलवाड़ करने की छूट नहीं प्रदान करता है।"
"एक बात और ध्यान में रखने की जरूरत है कि "भारतीय संविधान आस्था या उपासना के नाम पर 'लोक-व्यवस्था', 'स्वास्थ्य', 'सदाचार' और किसी की 'निजता' या 'एकान्तता' के साथ खिलवाड़ करने की छूट नहीं प्रदान करता है।"