मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

संविधान की प्रस्तावना



हमारे संविधान की प्रस्तावना के आदर्शों  जैसे- हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य...आदि का क्या महत्व रह गया है ? अलगाववाद और क्षेत्रवाद, आन्तरिक और वाह्य-स्तर पर देश की सम्प्रभुता को मिल रही चुनौतियां, सामाजिक-आर्थिक विषमता और भूखमरी,बेरोजगारी,साम्प्रदायिकता और छद्मपंथनिरपेक्षता(तुष्टीकरण),गठजोड़ और सौदेबाजी की राजनीति ने संविधान की प्रस्तावना के उपरोक्त पवित्र शब्दों को कलंकित कर दिया है। गणतंत्र दिवस मनाते समय हम अक्सर गर्व से प्रस्तावना के शब्दों का उच्चारण करते हैं। लेकिन क्या हमने अपने संविधान की प्रस्तावना में लिखित शब्दों को सार्थक बनाने का प्रयास किया है या इस बारे में सोचा है।
आज देश में दो राष्ट्रीय दलों की अंदरूनी राजनीति, अध्यक्षों-उपाध्यक्षों के चुनाव, दोनों दलों के वैचारिक टकराव पर हमारे लोकतंत्र के प्रहरी मीडिया सहित सभी बुद्धिजीवियों, यहां तक कि नौजवानों का ध्यान बंटा हुआ है। कल-परसों के बाद एक और गणतंत्र दिवस कुछ लच्छेदार भाषणों और कुछ देशभक्ति से जुड़े गीतों के साथ बीत जाएगा,लेकिन समस्याएं जस की तस रह जाएंगी।भय,भूख और भ्रष्टाचार की समस्याएं इस समय हाशिये पर चल रही है,क्योंकि मीडिया सहित देश के अधिकतर बुद्धिजीवी राहुल-राजनाथ-गडकरी में ही उलझे हुएं हैं। नियंत्रण-सीमा पार करके पाकिस्तान के अनेक घुसपैठी हमारे देश के अनेक हिस्सों में फैल चुके हैं और अपना अगला वार करने को तैयार हो चुके हैं जबकि हमारे लोकतंत्र के पहरेदार इस समय भगवा आतंक से परेशान है। उधर हमारे माओवादी-शत्रु भी लाल सलाम ठोंक रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जब तक सरकार विचार करेगी तब तक हम कार्रवाई करते रहेंगे।

हमारे संविधान की प्रस्तावना में शुरू के कुछ शब्दों जैसे- हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य...आदि का क्या महत्व रह गया है ? अलगाववाद और क्षेत्रवाद, आन्तरिक और वाह्य-स्तर पर देश की सम्प्रभुता को मिल रही चुनौतियां, सामाजिक-आर्थिक विषमता और भूखमरी,बेरोजगारी,साम्प्रदायिकता और छद्मपंथनिरपेक्षता(तुष्टीकरण),गठजोड़ और सौदेबाजी की राजनीति ने संविधान की प्रस्तावना के उपरोक्त पवित्र शब्दों को कलंकित कर दिया है। गणतंत्र दिवस मनाते समय हम अक्सर गर्व से प्रस्तावना के शब्दों का उच्चारण करते हैं। लेकिन क्या हमने अपने संविधान की प्रस्तावना में लिखित शब्दों को सार्थक बनाने का प्रयास किया है या इस बारे में सोचा है।
आज देश में दो राष्ट्रीय दलों की अंदरूनी राजनीति, अध्यक्षों-उपाध्यक्षों के चुनाव, दोनों दलों के वैचारिक टकराव पर हमारे लोकतंत्र के प्रहरी मीडिया सहित सभी बुद्धिजीवियों, यहां तक कि नौजवानों का ध्यान बंटा हुआ है। कल-परसों के बाद एक और गणतंत्र दिवस कुछ लच्छेदार भाषणों और कुछ देशभक्ति से जुड़े गीतों के साथ बीत जाएगा,लेकिन समस्याएं जस की तस रह जाएंगी।भय,भूख और भ्रष्टाचार की समस्याएं इस समय हाशिये पर चल रही है,क्योंकि मीडिया सहित देश के अधिकतर बुद्धिजीवी राहुल-राजनाथ-गडकरी में ही उलझे हुएं हैं। नियंत्रण-सीमा पार करके पाकिस्तान के अनेक घुसपैठी हमारे देश के अनेक हिस्सों में फैल चुके हैं और अपना अगला वार करने को तैयार हो चुके हैं जबकि हमारे लोकतंत्र के पहरेदार इस समय भगवा आतंक से परेशान है। उधर हमारे माओवादी-शत्रु भी लाल सलाम ठोंक रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जब तक सरकार विचार करेगी तब तक हम कार्रवाई करते रहेंगे।

नौकरशाही


देश की नौकरशाही में कितनी भी कमियां हो,लेकिन फिर भी यह देश की राजनीतिक व्यवस्था का इंजन है। लेकिन ऐसा माना जाने लगा है कि भारत का लक्ष्य तो विकास का है,किन्तु यहां कि नौकरशाही एक रुठे हुए मेजबान के रुप में देश के विकास रुपी मेहमान की उचित देखभाल करने में अक्षम साबित हुई है।इसके अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि भारत में अब तक निष्पक्ष नौकरशाही का विकास अब तक नहीं हो पाया है। लेकिन इन सबसे अलगनौकरशाही का राजनीतिकरण भी नौकरशाही के लिए एक बड़ी समस्या है। हालांकि इसके लिए राजनेता और प्रशासक दोनों ही जिम्मेदार हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा अपनी-अपनी प्रशासनिक मशीनरियों का अपने स्वार्थ के लिए किया जा रहा उपयोग भी एक बड़ी समस्या है।अभी हाल ही में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी का आयकर अधिकारियों को धमकाना भी न केवल राजनीतिक दृष्टि से अनैतिक है बल्कि नौकरशाही के राजनीतिकरण की धारणा को भविष्य में और हवा देने का प्रयास है। इससे अच्छे नौकरशाहों का मनोबल गिरेगा और साथ में निष्पक्ष नौकरशाही के विकास की प्रक्रिया भी बाधित हो सकती है। नौकरशाही के साथ राजनीतिक खिलवाड़ देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकता है।