मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की चार महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ

मेरे विचार से पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानववादी दर्शन की कुछ अतुलनीय, कालजयी और श्रेष्ठ उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं-
 (१) इसमें धर्म की धारणा को केवल पारलौकिक न मानकर इसे संसार में सुव्यवस्थित तरीके से रहने के आदर्श के रूप में स्वीकार किया गया है और साथ ही धर्म को नैतिकता व सदाचरण का पर्याय घोषित किया गया है।
(२) एकात्म मानववादी दर्शन अनेक पाश्चात्य विचारों की भाँति 'द्वन्द्व', 'प्रतिक्रिया', 'प्रतिस्पर्द्धा' और 'विरोध' पर आधारित न होकर 'समन्वय', व 'पारस्परिकता' पर आधारित है। साथ ही यह दर्शन 'सकारात्मक परिवर्तन' को महत्व देता है।
(३) इस दर्शन में विशिष्ट वर्गीय या अभिजन वर्गीय(Elitist) प्रवृत्ति पनपने की सम्भावना नहीं है क्योंकि इसमें मनुष्य, समाज और प्रकृति को एक दूसरे का पूरक व सहयोगी मानते हुए पारस्परिक समन्वय के साथ-साथ संयम व अनुशासन के माध्यम से लोकतन्त्र का आदर्श स्वरूप प्राप्त करने पर बल दिया गया है।
(४) यह दर्शन केवल शरीर, मन और बुद्धि के अस्तित्व को मान्यता देने वाले पाश्चात्य विचार-दर्शन की नकल नहीं करता है बल्कि यह शरीर, मन और बुद्धि के साथ-साथ 'आत्मा' एवं 'विराट चेतना' को महत्व देने वाले 'भारतीय विचार-दर्शन' का सशक्त प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय विचार-दर्शन के दैदीप्यमान गौरव को स्थापित करता है ।

लोकतांत्रिक जनकल्याणकारी राजनीति से ही होगा भारतीय राजनीतिक प्रणाली में सुधार

'लोकतांत्रिक जनकल्याणकारी राजनीति' वह प्रक्रिया है जिसके तहत 'सार्वजनिक कल्याण' के लिए औचित्यपूर्ण तरीके से 'न्यासिता रूपी सत्ता' प्राप्त करके 'विधिसम्मत तरीके से समाज में मूल्यों का प्राधिकारिक आवंटन' किया जाता है और 'जनसामान्य द्वारा प्राप्त प्रतिपुष्टि (फीडबैक) के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था में निरन्तर सुधार' किया जाता है। परन्तु वर्तमान समय में 'भारत की लोकतांत्रिक जनकल्याणकारी राजनीति' संकट में है क्योंकि वर्तमान समय में यहाँ न तो जनकल्याण की दिशा में सत्ता का सही तरीके से सदुपयोग हो पा रहा है और न ही औचित्यपूर्ण तरीके से मूल्यों का आवंटन ही हो पा रहा है। इसके अलावा भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में सुधार हेतु जनसामान्य का उचित फीडबैक प्राप्त न होना भी एक समस्या है। मेरे विचार से अब यह समय आ गया है कि 'लोग' अथवा 'जनसामान्य' (पब्लिक) 'कोउ नृप होउ हमें का हानि' और अपने 'अलग-अलग संकुचित स्वार्थों' से परे होकर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की दिशा में अपनी एक 'अभूतपूर्व' प्रतिपुष्टि (रिवोल्यूशनरी फीडबैक) दें। भारतीय जनता निजी स्वार्थों और संकीर्णताओं से परे होकर एकजुटता से एक मजबूत परिवर्तनकारी प्रतिपुष्टि देगी तभी भारतीय राजनीतिक प्रणाली में सुधार होगा।