गुरुवार, 27 सितंबर 2018

भारतीय पत्रकारिता-तंत्र में सुधार की जरूरत

भारतीय पत्रकारिता में सुधार के लिए यह जरूरी है कि वर्ष 2013 में आई पत्रकारों की न्यूनतम योग्यता से सम्बन्धित न्यायमूर्ति मारकंडेय काटजू समिति की संस्तुतियों (Recommendations of Jstice Katju Committee concerning minimum qualification for journalists in 2013) को पूरे भारत में केन्द्र स्तर से लेकर गाँव स्तर तक लागू किया जाए। यदि जरूरत पड़े तो इसके लिए भारतीय संविधान में संशोधन करके 'भारतीय मीडिया परिषद' बनाकर उसको जस्टिस काटजू कमिटी द्वारा पत्रकारों की योग्यता व पात्रता के सम्बन्ध में दी गई संस्तुतियों के आधार पर अपने यहाँ पत्रकारों को नियुक्त न करने वाले मीडिया संगठनों(समाचारपत्रों, पत्रिकाओं, टीवी-रेडियो चैनलों, न्यूज वेबसाइटों, न्यूज पोर्टलों इत्यादि) को अवैध करने और उनका लाइसेंस निरस्त करने का अधिकार दिया जाए। साथ ही भारतीय मीडिया कमीशन को प्रत्येक राज्यों, मंडलों, जिलो और ब्लॉकों में ऐसे सूचना पर्यवेक्षकों की नियुक्ति का अधिकार दिया जाए जो पत्रकारीय आचार संहिता या 'मीडिया एथिक्स' की अच्छी तरह से निगरानी (Monitoring) करें। इस 'भारतीय मीडिया परिषद' को 'स्वतंत्र लोकपाल' या 'स्वतंत्र न्यायपालिका' की तर्ज पर गठित किया जाए। साथ ही इस परिषद को सभी पत्रकारों के लिए यथोचित वेतन और भत्ते तय करने का भी अधिकार प्रदान किया जाए।

नौकरशाही ने बनाया भारतीय लोकतंत्र को बीमार

भारतीय लोकतंत्र एक गम्भीर बीमारी की चपेट में है जिसका समय रहते इलाज नहीं हुआ तो इसका क्षरण होना तय है और वह गम्भीर बीमारी है- "स्थायी कार्यपालिका अर्थात नौकरशाही की बढ़ती मनमानी, कार्यों में लापरवाही व अनुत्तरदायित्व की बढ़ती प्रवृत्ति, भ्रष्ट आचरण और पदाभिमान।"
   यह याद रखने की जरूरत है कि आज भी भारतीय नौकरशाही ब्रिटिशकालीन प्रभुत्ववादी व्यवहार से अपने आप को मुक्त नहीं कर पाई है और अभी भी यह 'अधीन राजनीतिक संस्कृति' वाली प्रवृत्ति अपनाये हुए है। इसके पीछे विभिन्न लोग विभिन्न कारण गिना सकते हैं लेकिन मेरे विचार से इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वह है "अस्थायी कार्यपालिका यानी जनता द्वारा चुनी हुई वास्तविक कार्यपालिका का नौकरशाही पर उचित लगाम न लग पाना और स्थायी कार्यपालिका के रूप में नौकरशाही का किसी भी स्थिति में अपने पद पर बने रहने का घमण्ड।"
   हालांकि पिछले कुछ आयोगों ने 'एक निश्चित आंशिक अवधि में किये गये कार्यों की अच्छाई या कमी के आधार पर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के पदोन्नति, पदावनति, निलम्बन और बर्खास्तगी' का सुझाव दिया है लेकिन उसका अनुपालन नहीं हो पाया है। इसके अलावा अस्थायी कार्यपालिका द्वारा अपने स्वार्थ के लिए नौकरशाही का राजनीतिकरण किया जाना भी नुकसानदायक साबित हुआ है। क्योंकि भारत की बुद्धिमान नौकरशाही जो कि "वास्तव में नौकरशाही न होकर अफसरशाही है", राजनीतिकरण के मामले में अस्थायी कार्यपालकों अर्थात राजनेताओं पर भारी पड़ती जा रही है। यहीं कारण है कि राजनेतागण तो थोड़े समय के लिए और थोड़ी ही मात्रा में अफसरशाही का राजनीतिकरण कर पाते हैं, लेकिन स्थायी कार्यपालिका के रूप में भारतीय शासन-तंत्र या 'सिस्टम' में गहरी पैठ बना चुकी अफसरशाही अपने हिसाब से और अपने मनचाहे तरीके से भारतीय राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों के साथ 'राजनीतिकरण' का माइंड गेम खेलने में सिद्धहस्त हो चुकी है। अब भारतीय अफसरशाही ने अपने फायदे के हिसाब भारतीय राजनेताओं के साथ राजनीति करना शुरू कर दिया है। यहीं कारण है कि जो राजनीतिक दल इन अफसरशाहों की उम्मीदों या मनोकामनाओं पर खरा उतरते हैं उनके साथ यह बढ़िया तालमेल बनाकर उसका प्रभाव बढ़ाती रहती है जबकि उम्मीदों या अपनी लाभकारी इच्छाओं पर खरा न उतरने वाले राजनीति दलों और राजनेताओं के साथ तालमेल न बनाकर इनके प्रभाव या लोकप्रियता को गिराने में लग जाती है। वर्तमान समय में भी अनेक राज्यों की सत्ताधारी सरकारों के साथ भारतीय अफसरशाही द्वारा खिलवाड़ जारी है। जो भी निर्देश दिये जा रहे हैं या जो भी नीतियाँ बन रही है उन्हे क्रियान्वित करने व लागू करने में जानबूझकर देर की  जा रही है। जो कार्य हो भी रहे हैं उनमें कमियाँ ही कमियाँ दिख रही हैं। चाहे पुलिस हो या प्रशासनिक अधिकारी, सभी जानबूझकर गलतियाँ करने और गड़बड़ियों को बढ़ावा देने में लगे हैं।
   वर्तमान भारतीय अफसरशाही जिन अवगुणों से ग्रसित है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं -- (1) प्रशासनिक जिम्मेदारियों व कार्यों के प्रति उदासीनता (2) अपनी जिम्मेदारियों को एक-दूसरे पर थोपने की प्रवृत्ति (3) कार्यकुशलता व दक्षता का अभाव (4) प्रत्येक कार्यों में विलम्ब करने और अवरोध उत्पन्न करने की प्रवृत्ति (5)  उत्तरदायित्व के प्रति उदासीनता (6) स्वार्थ पूर्ति के लिए पद का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति (7) रिश्वतखोरी (8) लालफीताशाही (9) दलीय और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ ही पक्षपातयुक्त व्यवहार अपनाने और पूर्वाग्रह से ग्रसित होने की प्रवृत्ति (10) भाई-भतीजावाद (11) उद्योगपतियों और बाहुबलियों से घनिष्ठता (12) प्रतिष्ठित राजनेताओं और मंत्रियों के प्रति निष्ठा (13) ब्रिटिशकालीन पदाभिमान से ग्रसित (14) स्वयं को लोक सेवक की बजाय 'लोक साहब' समझने की प्रवृत्ति (15) कम समय में अधिक से अधिक सम्पत्ति और प्रतिष्ठा अर्जित करने की प्रवृत्ति। इन्हें दूर किये बिना भारतीय नौकरशाही में सुधार असम्भव है।
   इसलिए मेरे विचार से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अफसरशाही पर लगाम कसने का समय आ चुका है। अब समय की माँग है कि राजनेतागण अफसरों को अपने प्रभाव में रखें न कि स्वयं उनसे प्रभावित हों। सभी प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की स्थिति में क्रान्तिकारी बदलाव की सख्त जरूरत है। इन्हे राजनीतिकरण से मुक्त करते हुए अल्पकालिक अवधि में इनके द्वारा किये गये कार्यों का मूल्यांकन करके इनकी पदोन्नति, पदावनति, निलम्बन, बर्खास्तगी, स्थानान्तरण इत्यादि का निर्धारण कठोरता से किया जाना आवश्यक है। उनकी यह 'अल्पकालिक उत्तरदायित्व अवधि 'तीन वर्ष' रखी जा सकती है।
                 --शशांक कुमार राय, स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

श्रीमद्भागवद्गीता का सन्देश : योग्यता का सम्मान हो

श्रीमद्भागवद्गीता के 'निष्काम कर्मयोग' अथवा 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्' की परिकल्पना के मूल तत्व को समझना आवश्यक है। यहाँ निष्काम कर्मयोग का अभिप्राय स्वयं की एवं समाज की उन्नति हेतु निष्काम कर्म करना है, बेगारी करना या बिना पारिश्रमिक प्राप्त किये किसी व्यक्ति या संस्था या समूह के अधीन कार्य करना नहीं है। क्योंकि "सम्पूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता अन्याय और अधर्म के विरोध के संदेश पर ही आधारित है।" बेगारी करना और बिना पारिश्रमिक के कार्य करना स्वयं व स्वयं के परिवार के साथ अन्याय करना है। "अन्याय के विरुद्ध युद्ध ही श्रीमद्भागवद्गीता का मुख्य संदेश है।" श्रीमद्भागवद्गीता का दूसरा महत्वपूर्ण सन्देश यह है कि "अपनी योग्यता के अनुरूप उत्तरदायित्व या पद प्राप्त करना ही न्याय है।" यही सन्देश प्रचीन यूनानी दार्शनिक 'प्लेटो' ने भी दिया था। उदाहरणार्थ - "भगवान श्रीकृष्ण यह भली-भाँति जानते थें कि हस्तिनापुर का शासक बनने हेतु कौन योग्य है और कौन अयोग्य। वह योग्य लोगों को शासक बनाने के पक्ष में थें। वे चाहते तो पांडवों को हस्तिनापुर के राजसिंहासन की कामना या मोह को छोड़कर कोई अन्य कार्य करने का सुझाव दे सकते थें लेकिन वे न्याय चाहते थे और 'योग्यता व पात्रता का सम्मान' चाहते थें। इसीलिए उन्होंने पांडवों को युद्ध के लिए तैयार किया, उनका साथ दिया और उनकी योग्यता के अनुरूप उनको उनके पद पर स्थापित कराया।" इसलिए 'श्रीमद्भागवद्गीता' के इन महत्वपूर्ण सन्देशों पर अमल करते हुए 'श्रम के शोषण व बेगारी' को समाप्त किया जाना चाहिए और 'योग्यता व पात्रता के अनुरूप कार्य और कार्य के अनुरूप वेतन या पारिश्रमिक' को अनिवार्य रूप से प्रभावी करके 'न्याय की स्थापना' की जानी चाहिए।