श्रीमद्भागवद्गीता के 'निष्काम कर्मयोग' अथवा 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्' की परिकल्पना के मूल तत्व को समझना आवश्यक है। यहाँ निष्काम कर्मयोग का अभिप्राय स्वयं की एवं समाज की उन्नति हेतु निष्काम कर्म करना है, बेगारी करना या बिना पारिश्रमिक प्राप्त किये किसी व्यक्ति या संस्था या समूह के अधीन कार्य करना नहीं है। क्योंकि "सम्पूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता अन्याय और अधर्म के विरोध के संदेश पर ही आधारित है।" बेगारी करना और बिना पारिश्रमिक के कार्य करना स्वयं व स्वयं के परिवार के साथ अन्याय करना है। "अन्याय के विरुद्ध युद्ध ही श्रीमद्भागवद्गीता का मुख्य संदेश है।" श्रीमद्भागवद्गीता का दूसरा महत्वपूर्ण सन्देश यह है कि "अपनी योग्यता के अनुरूप उत्तरदायित्व या पद प्राप्त करना ही न्याय है।" यही सन्देश प्रचीन यूनानी दार्शनिक 'प्लेटो' ने भी दिया था। उदाहरणार्थ - "भगवान श्रीकृष्ण यह भली-भाँति जानते थें कि हस्तिनापुर का शासक बनने हेतु कौन योग्य है और कौन अयोग्य। वह योग्य लोगों को शासक बनाने के पक्ष में थें। वे चाहते तो पांडवों को हस्तिनापुर के राजसिंहासन की कामना या मोह को छोड़कर कोई अन्य कार्य करने का सुझाव दे सकते थें लेकिन वे न्याय चाहते थे और 'योग्यता व पात्रता का सम्मान' चाहते थें। इसीलिए उन्होंने पांडवों को युद्ध के लिए तैयार किया, उनका साथ दिया और उनकी योग्यता के अनुरूप उनको उनके पद पर स्थापित कराया।" इसलिए 'श्रीमद्भागवद्गीता' के इन महत्वपूर्ण सन्देशों पर अमल करते हुए 'श्रम के शोषण व बेगारी' को समाप्त किया जाना चाहिए और 'योग्यता व पात्रता के अनुरूप कार्य और कार्य के अनुरूप वेतन या पारिश्रमिक' को अनिवार्य रूप से प्रभावी करके 'न्याय की स्थापना' की जानी चाहिए।
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