गुरुवार, 9 मई 2019

छद्म राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद

--:छद्म राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद:--

छद्म राष्ट्रवाद एक प्रकार की नकारात्मकता से युक्त विचारधारा है जिसका इस्तेमाल तमाम दक्षिणपंथी पार्टियां और कट्टरपंथी व उग्रवादी या आतंकवादी संगठन दुनियाभर में करते आये हैं।
छद्म राष्ट्रवाद इतिहास के एक ख़ास समय के एक ख़ास पंथ या संस्कृति को महत्व देने की बात करता है। "यह उस राष्ट्रवाद के बिलकुल उलट है जो अपने देश में 'समाहित मिश्रित संस्कृति' में अपना गौरव देखता है तथा जो अपने देश, अपनी सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना को प्रगतिशीलता के मार्ग पर आगे बढ़ने की जरूरत मानता है।"
छद्म राष्ट्रवाद हमें देश के लिए जान देने से ज्यादा जान लेना सिखाता है। यह वह राष्ट्रवाद है जो खुद की आलोचना को हमेशा देशद्रोह से जोड़कर देखता है। इस छद्म राष्ट्रवाद ने अपने नायकों को कभी भी उस काल में नहीं ढूंढा जिसमें भारत की स्वतंत्रता और उसके निर्माण में लगे लोग कुर्बानियां दे रहे थे।" इसने उन्हें बहुत पीछे जाकर ढूंढा ताकि उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल किया जा सके और जहां एक वीर नायक के हर पराक्रम को दूसरे धर्म के विरुद्ध लड़ा गया धर्म युद्ध बताया जा सके।"
"उक्त छद्म राष्ट्रवाद के विपरीत भारत के वास्तविक राष्ट्रवाद का निर्माण 'संवैधानिक देशभक्ति' से हुआ है, जिसमें हमारी साझी विरासत और विविधता के प्रति प्रशंसा का भाव शामिल है और जो भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन से उपजे विविध पंथों, संस्कृतियों, वर्गों और आस्थाओं के समान सहअस्तित्व पर बल देता है।"
 "भारतीय राष्ट्रवाद किसी एक धर्म, एक संस्कृति और किसी एक भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि यह समस्त भारतीयों की सामूहिक एकता, बहुलवादिता, बहुसांस्कृतिकता और सर्वपंथ समभाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो 'विविधता में एकता' की संकल्पना पर आधारित है।"

सोमवार, 6 मई 2019

भारतीयता का प्रतीक है बहुसांस्कृतिवाद

"भारत 'एकल सांस्कृतिवाद(यूनी कल्चरलिज्म)' तथा 'एकीकृत सांस्कृतिवाद(मोनो कल्चरलिज्म)' का नहीं बल्कि 'बहुसांस्कृतिवाद(मल्टी कल्चरलिज्म)' का प्रतिनिधित्व करता है।" बहुसांस्कृतिवाद का तात्पर्य है ऐसी विचारधारा से है जिसमें अनेक संस्कृतियों के अपने-अपने अस्तित्व या अपनी-अपनी अलग पहचान को बनाये रखते हुए पारस्परिक समन्वय पर बल दिया जाता है। यह एकल सांस्कृतिवाद या यूनी कल्चरलिज्म (जिसमें केवल एक ही संस्कृति विशेष को प्रधानता दी जाती है ) और एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म (जिसमें अनेक संस्कृतियाँ किसी एक संस्कृति में मिश्रित या एकीकृत होकर धीरे-धीरे अपनी पहचान त्याग कर उसी संस्कृति में एकाकार हो जाती है) से भिन्न होती है क्योंकि बहुसांस्कृतिवाद में अनेक संस्कृतियाँ आपस में समन्वित तो होती है परन्तु अपनी पहचान नहीं खोती। जैसे सलाद में परिवर्तित हो जाने के बावजूद भी गाजर, मूली, टमाटर खीरा, प्याज, मिर्च आदि अपनी पहचान नहीं खोते जबकि 'गलन पात्र या मेल्टिंग पॅाट'(जो एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म का प्रतीक है) में चारो ओर जल रही अनेक रंगों की मोमबत्तियां बाद में गलकर मोम के रूप में जमा हो जाती है और अपनी पहचान खो देती हैं।
 "भारत में कुछ संगठन सभी भारतीय संस्कृतियों को किसी 'एक खास संस्कृति' के अन्तर्गत 'समाहित' करने (एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म) पर जबकि कुछ संगठन 'एक ही संस्कृति(एकल सांस्कृतिवाद यानी यूनी कल्चरलिज्म) को बढ़ावा देने पर बल देते हैं।" "ऐसे संगठनों को 'भारतीयता' का प्रतीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये संगठन 'बहुसांस्कृतिवाद' को स्वीकार नहीं करते है", जबकि "बहुसांस्कृतिवाद ही 'भारतीयता' की असली पहचान है।" अत: 'बहुसांस्कृतिवाद में विश्वास न करने वाले संगठनों से परहेज किया जाना चाहिए !"
     -- शशांक कुमार राय, स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

ज़िन्दगी (कविता)

--:ज़िन्दगी:--

"न जाने कितने रंग दिखाती है जिन्दगी,
हर मोड़ पर सबक सीखाती है जिन्दगी।
मुश्किलों की राहों से क्यों होते हो परेशान,
ठोकरों से भी सँभलना सीखाती है जिन्दगी।
दर्द का मुस्कुराकर सामना करो,
काँटों के साथ फूल भी खिलाती है जिन्दगी।
माना कि अपने सितारे अभी है छिपे हुए,
पर अँधेरे के बाद रोशनी लाती है जिन्दगी।
ख्वाबों को अभी है हकीकत की जूस्तजू,
इन्तजार करने का मजा दिलाती है जिन्दगी।
दिल में दर्द का सैलाब, चेहरे पे शिकन तक न हो,
जिन्दगी को भी जीना सीखाती है जिन्दगी।
कब तक छिपी रहेंगी अपनी कमजोरियाँ,
खुद को भी आइना दिखाती है जिन्दगी।"
                          -शशांक कुमार राय

बुधवार, 24 अप्रैल 2019


        --:"स्नातक-शिक्षा की गुणवत्ता हेतु 'नेट(एनईटी)' उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता हो जरूरी !":--
                                       --शशांक कुमार राय

     विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में कहीं भी स्नातक-स्तर पर 'असिस्टेंट प्रोफेसर' के पद पर नियुक्ति के लिए 'नेट की अनिवार्यता' बनाये रखना ही 'स्नातक शिक्षा की गुणवत्ता' के लिए उचित है! इसमें बदलाव किसी भी हाल में और किसी के भी द्वारा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहीं उचित भी है और तर्कसंगत भी!
   नेट (NET) परीक्षा में 'विषय का गहराई से परीक्षण' होता है। साथ ही तार्किक क्षमता, शोध क्षमता, शिक्षण कौशल, सूचना तकनीक, संचार कौशल, पठन क्षमता, गणना क्षमता, उच्च शिक्षा, पर्यावरण ज्ञान और भारतीय संविधान व राज्यव्यवस्था सम्बन्धी जानकारियों का पारदर्शी व उचित तरीके से परीक्षण होता है। एक स्नातक स्तरीय शिक्षक के लिए यह परीक्षण आवश्यक है ताकि 'स्नातक-शिक्षा की गुणवत्ता' बनी रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए पिछले 'पचीस-तीस वर्षों' से 'नेट' परीक्षा कराई जा रही है तथा अब तक 'नेट' को 'पीएचडी में प्रवेश' और 'स्नातक-स्तर पर सहायक प्राध्यापक या व्याख्याता पद' पर नियुक्ति के लिए अनिवार्य माना जाता रहा है। यह तर्कसंगत भी है और 'स्नातक स्तरीय शिक्षा की गुणवत्ता के लिए आवश्यक' भी। इसलिए इस व्यवस्था में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए!
   "एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के पद पर पदोन्नति सहित 'परास्नातक व एम.फिल. स्तर पर शिक्षण' के लिए 'नेट के साथ पीएचडी' को अनिवार्य किया जा सकता है।" स्नातक-स्तर पर शिक्षण-कार्य हेतु 'शोध' की अपेक्षा 'विषय-ज्ञान' अधिक महत्वपूर्ण होता है। शोध कार्य तो परास्नातक व एम.फिल. में 'लघुशोध-प्रबन्ध(Dissertation)' तैयार करने तथा पी-एच.डी. में 'शोध-प्रबन्ध(Thesis)' तैयार करने में होता है।
   "2009 और 2016 के रेगुलेशन से पीएचडी करने वालों को 'स्नातक-कक्षाओं' में पढ़ाने के लिए योग्य मानते हुए उन्हें 'नेट(NET) से छूट' प्रदान करना, 'नेट-उत्तीर्ण प्रतिभाशाली, परिश्रमी और पूरे विषय का ज्ञान रखने वाले लोगों' के लिए 'छलावा' होने के साथ-साथ  'स्नातक-स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता' के साथ 'खिलवाड़' है।" ' स्नातक-शिक्षा' में 'किसी एक टॉपिक पर शोध व एक-दो टॉपिक पर रिसर्च पेपर-पब्लिकेशन' की बजाय 'सम्पूर्ण विषय के ज्ञान' का महत्व अधिक होता है, क्योंकि 'स्नातक-स्तर' पर 'पूरा विषय' पढाया जाता है। इसलिए "स्नातक-स्तर के शिक्षकों को किसी भी दशा में 'नेट से छूट' प्रदान करना एकदम अनुचित और 'स्नातक-शिक्षा' की गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ है।
"मेरा मत तो यह है कि परास्नातक+एम.फिल+नेट के प्राप्तांकों को जोड़कर 'मेधा-सूची'(Merit List)' तैयार की जानी चाहिए और उसी आधार रिक्तियों के अनुसार 'मेरिट-लिस्ट' में जगह बनाने वाले परास्नातक+एम.फिल.+नेट उपाधिधारकों को 'स्नातक-शिक्षक(सहायक प्राध्यापक या प्रवक्ता) के रूप में नियुक्ति कर दी जानी चाहिए" जबकि "'परास्नातक और एम.फिल.' कक्षाओं में पढ़ाने के लिए 'नेट(N.E.T.) और पी-एच.डी.' को 'अनिवार्य' बनाया जाना चाहिए।"               
  लेखक परिचय --शशांक कुमार राय, S/O-श्री सहजानन्द राय, ग्राम व पोस्ट-रेवतीपुर, मुहल्ला-भीष्मदेव राय, थाना व ब्लाक-रेवतीपुर, जिला-गाजीपुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-232328, मोबाइल नम्बर - 9559451961
 शैक्षिक परिचय :-- (1) एम.ए., राजनीति विज्ञान(75.50%)-2007, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(बीएचयू), वाराणसी
(2) स्नातकोत्तर डिप्लोमा, हिन्दी पत्रकारिता (64.50%)-2010, भारतीय जनसंचार संस्थान(आईआईएमसी), नई दिल्ली,
(3) बी.एड.(70.70%) -2012, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश
(4) सामाजिक विज्ञान विषय, हिन्दी,अंग्रेजी,शिक्षा मनोविज्ञान विषयों के साथ उच्च प्राथमिक स्तरीय केन्द्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा(Upper Primary Level C.T.E.T. Qualified With Social Sience, Hindi, English, Education Psychology)-2016, 62% अंक के साथ उत्तीर्ण(Qualified with 62% Marks), obtained 93 in 150 (150 में 93 अंक प्राप्त)
(5) एम.फिल. राजनीति विज्ञान(62.83%)-2016, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
(6) "सहायक प्राध्यापक हेतु राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा(National Eligibility Test for Assistant Professor)- जुलाई, 2018 में उत्तीर्ण
कार्य परिचय - "बेरोजगार"

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

आतंकवाद के अन्त के लिए एकजुट हो सभी शक्तिशाली राष्ट्र

पुलवामा हमले की जिम्मेदारी लेने वाला आतंकी संगठन 'जैश-ए-मुहम्मद' किसी दूसरे ग्रह पर तो है नहीं! सब लोग भलीभाँति जानते हैं कि 'लश्कर-ए-तैयबा' और 'जैश-ए-मुहम्मद' किस धरती पर पल रहे हैं ? लेकिन चूँकि वर्तमान में भारत ही इसका प्रमुख 'भुक्तभोगी' है इसलिए 'विश्व के अन्य बड़े देशों' में इसके प्रति कोई चिन्ता एवं गम्भीरता दिखाई नहीं दे रही है। 9/11 के आतंकी आक्रमण की चोट खा चुका अमेरिका भी अब 'आतंकवादियों के प्रति उदार' बन रहा है जबकि उसे यह बात अच्छी तरह पता होनी चाहिए कि 'आतंकवाद की चोट' समय और परिस्थिति के अनुसार कभी भी किसी को भी घायल कर सकती है।
  पुलवामा पर हमले की नई शैली से इस बात का पूरा संकेत मिल चुका है कि 'पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद' अब 'आईएसआईएस' और 'तालिबान' से तनिक भी भिन्न नहीं है। आतंकवाद के ये तीनों स्वरूप 'सम्पूर्ण विश्व' के लिए 'समान रूप से खतरनाक' हैं। इसलिए भारत सहित 'विश्व के समस्त बड़े राष्ट्रों' को 'आतंकवाद के इन तीनों पाकिस्तानी, तालिबानी और सीरियाई स्वरूपों के विरूद्ध एकजुट होकर युद्ध करना होगा।
  आतंकवाद के इन तीनों स्वरूपों को समाप्त करने के लिए विश्व के सभी शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा भारत के साथ मिलकर गम्भीरतापूर्वक 'कठोर कार्रवाई' करनी ही होगी, अन्यथा "आतंकवाद के माध्यम से एक सम्प्रदाय-विशेष की ओर से लड़ी जा रही 'सभ्यता-एकाधिकारवाद' की लड़ाई 'पूरे विश्व के लिए महासंकट' बन जाएगी।" तब पछताने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय शेष नहीं रहेगा !!
     -- शशांक कुमार राय, राजनीतिक विश्लेषक

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

रामायण और रामचरितमानस की महिमा

"महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस श्रेष्ठ आचरण आधारित मनुष्य के स्वधर्मपालन से जुड़े पवित्र ग्रंथ हैं। इनमें वर्णित भगवान श्रीराम, माता सीता, भगवान हनुमान, परमपूज्य भरत, श्रद्धेय लक्ष्मण, निषादराज गुह, माता शबरी, माता कौशल्या-कैकेयी-सुमित्रा, माता ऊर्मिला, श्रद्धेय शत्रुघ्न, राजा दशरथ, वानरराज सुग्रीव, कपिश्रेष्ठ अंगद, नल व नील, विभीषण, रावण, मन्दोदरी, मेघनाथ समेत समस्त पात्र "मानवता की आचरण शैली के श्रेष्ठ प्रतिनिधि हैं।"
इसके अलावा "भगवान श्रीराम, माता सीता, महावीर कपिमुनि भगवान हनुमान, श्रद्धेय भरत व लक्ष्मण" ये सभी लोग "श्रेष्ठ मानवीय आचरणों की प्रतिमूर्ति हैं तथा समस्त मानवता के लिए प्रेरणाप्रद हैं।"
"राम एक संस्कृति हैं और श्रेष्ठ मानवता के सर्वोच्च आदर्श हैं।" 'राम' जाति, वर्ग, पंथ, देश, इत्यादि से परे "समस्त मानवता के आचरण-ईष्ट, महापुरुष और एक 'सर्वश्रेष्ठ वैश्विक महामानव" हैं। 'माता सीता' समस्त नारी जगत के लिए 'अनमोल आदर्श' हैं। वहीं कपिमुनि भगवान हनुमान संयम, त्याग, कर्तव्यपालन, स्वानुशासन, बुद्धिमत्ता, वीरता तथा अन्य सभी श्रेष्ठ गुणों से युक्त परम वन्दनीय ईष्ट-देव हैं। "वहीं दूसरी ओर 'त्याग, समर्पण और प्रेम' की प्रतिमूर्ति 'पूज्यनीय भरत जी' वर्तमान मानव समाज के 'प्रेरणा-पुरुष' हैं।"
"चूँकि दोनों पावन ग्रंथ 'रामायण' और 'रामचरितमानस' मानव धर्म, पुरुष व स्त्री धर्म, भ्रातृ धर्म, सेवा-धर्म, मित्र-धर्म, कर्तव्य-धर्म, राजधर्म इत्यादि के साथ-साथ प्रेम, त्याग, तपस्या, समर्पण, साधना, अनुशासन, सदाचार, नैतिकता, वैराग्य, मानवता, सज्जनता, सच्चरित्रता, निष्काम कर्मयोग एवं सच्ची लगन व सच्ची भक्ति सहित अनेक सद्गुणों के साक्षात प्रतिबिम्ब अथवा सच्चे प्रतीक हैं" इसलिए मैं महर्षि वाल्मीकि और उनकी कृति रामायण तथा गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस सहित इन ग्रंथों का सम्मान, अध्ययन व श्रवण करने वाले समस्त श्रेष्ठ जनों को मैं सादर वन्दन करता हूँ। अन्त में 'रामचरितमानस' के उत्तम विश्लेषक 'परम पूज्य  आचार्य मुरारी बापू' को बारम्बार प्रणाम करता हूँ।"
                                            --शशांक कुमार राय