"भारत 'एकल सांस्कृतिवाद(यूनी कल्चरलिज्म)' तथा 'एकीकृत सांस्कृतिवाद(मोनो कल्चरलिज्म)' का नहीं बल्कि 'बहुसांस्कृतिवाद(मल्टी कल्चरलिज्म)' का प्रतिनिधित्व करता है।" बहुसांस्कृतिवाद का तात्पर्य है ऐसी विचारधारा से है जिसमें अनेक संस्कृतियों के अपने-अपने अस्तित्व या अपनी-अपनी अलग पहचान को बनाये रखते हुए पारस्परिक समन्वय पर बल दिया जाता है। यह एकल सांस्कृतिवाद या यूनी कल्चरलिज्म (जिसमें केवल एक ही संस्कृति विशेष को प्रधानता दी जाती है ) और एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म (जिसमें अनेक संस्कृतियाँ किसी एक संस्कृति में मिश्रित या एकीकृत होकर धीरे-धीरे अपनी पहचान त्याग कर उसी संस्कृति में एकाकार हो जाती है) से भिन्न होती है क्योंकि बहुसांस्कृतिवाद में अनेक संस्कृतियाँ आपस में समन्वित तो होती है परन्तु अपनी पहचान नहीं खोती। जैसे सलाद में परिवर्तित हो जाने के बावजूद भी गाजर, मूली, टमाटर खीरा, प्याज, मिर्च आदि अपनी पहचान नहीं खोते जबकि 'गलन पात्र या मेल्टिंग पॅाट'(जो एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म का प्रतीक है) में चारो ओर जल रही अनेक रंगों की मोमबत्तियां बाद में गलकर मोम के रूप में जमा हो जाती है और अपनी पहचान खो देती हैं।
"भारत में कुछ संगठन सभी भारतीय संस्कृतियों को किसी 'एक खास संस्कृति' के अन्तर्गत 'समाहित' करने (एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म) पर जबकि कुछ संगठन 'एक ही संस्कृति(एकल सांस्कृतिवाद यानी यूनी कल्चरलिज्म) को बढ़ावा देने पर बल देते हैं।" "ऐसे संगठनों को 'भारतीयता' का प्रतीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये संगठन 'बहुसांस्कृतिवाद' को स्वीकार नहीं करते है", जबकि "बहुसांस्कृतिवाद ही 'भारतीयता' की असली पहचान है।" अत: 'बहुसांस्कृतिवाद में विश्वास न करने वाले संगठनों से परहेज किया जाना चाहिए !"
-- शशांक कुमार राय, स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
"भारत में कुछ संगठन सभी भारतीय संस्कृतियों को किसी 'एक खास संस्कृति' के अन्तर्गत 'समाहित' करने (एकीकृत सांस्कृतिवाद या मोनो कल्चरलिज्म) पर जबकि कुछ संगठन 'एक ही संस्कृति(एकल सांस्कृतिवाद यानी यूनी कल्चरलिज्म) को बढ़ावा देने पर बल देते हैं।" "ऐसे संगठनों को 'भारतीयता' का प्रतीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये संगठन 'बहुसांस्कृतिवाद' को स्वीकार नहीं करते है", जबकि "बहुसांस्कृतिवाद ही 'भारतीयता' की असली पहचान है।" अत: 'बहुसांस्कृतिवाद में विश्वास न करने वाले संगठनों से परहेज किया जाना चाहिए !"
-- शशांक कुमार राय, स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
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